प्राचीन विश्व के सात अज़ूबों में से एक ‘ओलंपिया में ज़ीउस की मूर्ति’ के बारे में जानिए।

ओलंपिया में ज़ीउस की मूर्ति

ओलंपिया में ज़ीउस की मूर्ति प्राचीन विश्व के सात अज़ूबों में से एक है। इस मूर्ति को प्राचीन ग्रीक के मूर्तीकार फिडायस ने 432 ईसापूर्व में बनाना शुरू किया और लगभग 12 साल की कड़ी मेहनत के बाद इसका निर्माण पूरा किया। वर्तमान समय में यह मूर्ति हमारे बीच मौजूद नहीं है। कहा जाता है कि 475 ईसवी में यह मूर्ति जलकर नष्ट हो गई थी।

ज़ीउस (Zeus) को प्राचीन ग्रीक के देवताओं का राजा माना जाता है। प्राचीन ग्रीक में ओलंपिक खेल ज़ीउस देवता के सम्मान में ही आयोजित किए जाते थे।

प्राचीन ओलंपिया शहर में देवता ज़ीउस के सम्मान में एक मंदिर का निर्माण किया गया था जो दो नदियों के बीच स्थित एक छोटे से जंगल में बना हुआ था। 432 ईसा पूर्व के आसपास, मंदिर में देवता ज़ीउस की मूर्ति बनाने के लिए, ग्रीक के सबसे प्रसिद्ध मूर्तिकार फिडायस (Phidias) ओलंपिया पहुँचे। फिडायस ने मंदिर के बगल में ही अपनी वर्कशाप की स्थापना की जिसमें मूर्ति के हिस्सों को बनाना शुरू कर दिया।

12 साल की मेहनत के बाद जब मूर्ति बनकर तैयार हुई तो उसकी खूबसूरती और भव्यता को देखकर हर कोई हैरान हो गया। मूर्ती में जीउस को बैठी हुई अवस्था में दिखाया गया था। मूर्ति की ऊँचाई लगभग 42 फीट थी।

मूर्ति का ज्यादातर हिस्सा लकड़ी का बना हुआ था जिसे हाथीदांत और अन्य चीज़ों द्वारा कवर कर दिया गया। चेहरा और पैर हाथीदांत के बनाए गए थे। लबादा (चोला), सैंडल, दाढ़ी और बाल सोने के बनाए गए थे। ज़ीउस की मूर्ति के सिर पर चांदी की बनी एक जैतून की माला पहनी हुई थी। सिंहासन सोने, कांस्य, कीमती पत्थरों, हाथीदांत और कई तरह के रत्नों से बना हुआ था। सिंहासन पर पौराणिक कथाओं में वर्णित दृश्यों को चित्रित किया गया था।

जीउस की मूर्ति के दाहिने हाथ में जीत की देवी की एक छोटी सी मूर्ति पकड़ी हुई थी और और बाएं हाथ में राजदण्ड था, जो दुर्लभ धातुओं और गहनों से बना था। मूर्ति के पैरों के आगे एक कुंड बनाया गया था जिसमें जैतून का तेल भरा हुआ था। यह इसलिए किया गया था ताकि ओलंपिया की नम जलवायु में हाथीदांत से बने हुए हिस्सों में दराड़ ना आ जाए। इसके सिवाए इस कुंड की वजह से प्रकाश परिवर्तित होकर मूर्ति पर पड़ता था जो इसकी भव्यता को और बढ़ा देता था।

392 ईसवी तक ग्रीक पर रोमनों का राज हो चुका था जो कि ईसाई धर्म को मानते थे। उन्होंने ओलंपिक खेलों को बंद करवा दिया क्योंकि यह एक गैर ईसाई देवता जीउस के सम्मान में खेले जाते थे। इसके सिवाए उन्होंने इसे मूर्तिपूजा से भी जोड़ा।

392 ईसवी के बाद जीउस की मूर्ति के साथ क्या हुआ इसके कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलते। कहा जाता है कि जब 426 ईसवी में थियोडोसियस राजा ने सभी गैर ईसाई मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया तब इस मूर्ति को नष्ट कर दिया गया हो। कुछ अभिलेखों से ये भी पता चलता है कि लैसस नाम का एक युनानी व्यक्ति इसे कांस्टेंटिनोपल शहर (Constantinople – वर्तमान इस्तांबुल) ले गया जहां 475 ईस्वी में एक बड़ी आग में यह मूर्ति नष्ट हो गई।

पुरातात्विक खोज़ों से मंदिर का घेरा, तेल का कुंड और फिडायस की वर्कशाप को तो खोज़ लिया गया है पर देवताओं के राजा ज़ीउस की मूर्ति का कोई भी अंश नहीं मिला।

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Comments

  1. mahendra pratap singh

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  2. Zahidul Islam

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  3. rovin singh

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  4. Achhipost

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