मंगल पांडे सिर्फ 22 साल की उम्र में बने थे सैनिक, जानें उनका पूरा इतिहास

मंगल पांडे अंग्रेज़ी राज के समय अंग्रेज़ सेना के एक सिपाही थे। शुरूआत में मंगल पांडे अपने ब्रिटिश मालिकों की बहुत इज्जत करते थे। पर धीरे – धीरे जब अंग्रज़ों का भारतीय जनता के प्रति व्यवहार हिंसक होता गया, वैसे – वैसे मंगल पांडे के मन में उनके प्रति गुस्सा भरने लगा।

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मंगल पांडे अंग्रेज़ों के विरुद्ध तब और ज्यादा भड़क उठे जब उन्हें पता लगा कि अंग्रेज़ सरकार उन्हें ऐसे कारतूस दे रही है जिनमें गाय और सुअर की चर्बी लगी होती है। उन्हें लगा कि अंग्रेज़ उनका धर्म भ्रष्ट करना चाहते है और उन्होंने इस बात लेकर विद्रोह कर दिया। विद्रोह करने के कारण उन्हें गिरफ़्तार करके फांसी की सज़ा दे दी गई।

मंगल पांडे की फांसी के बाद पूरे उत्तर भारत में विद्रोह भड़क गया जिससे ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन बुरी तरह से हिल गया।

जन्म और माता पिता

मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम दिनकर पांडे और माता का नाम अभयरानी था।

मंगल पांडे की एक भहन और तीन भाई भी थे। भहन की मौत तो 1830 में ही हो गई थी पर उनके भाइयों के वंशज आज भी हैं।

मंगल पांडे अंग्रेज़ सेना में भर्ती कैसे हुए ?

एक बार मंगल पांडे किसी काम से अकबरपुर आये थे। उसी समय ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना बनारस से लखनऊ जा रही थी। मंगल पांडे सेना का मार्च देखने के लिए कौतुहलवश सड़क के किनारे आकर खड़े हो गये। एक सैनिक अधिकारी ने मंगल पांडे को तगड़े और स्वस्थ देखकर सेना में भर्ती हो जाने का आग्रह किया, गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें रोजी-रोटी की मजबूरी ने अंग्रेजों की फौज में नौकरी करने पर मजबूर कर दिया।

वे 10 मई सन 1846 में 22 वर्ष की आयु में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती हुए। उन्हें केवल 7 रूपए महीना वेतन मिलता था। उनकी ड्यूटी 34वीं बंगाल पैदल सेना में थी।

गाय और सुअऱ की चर्बी वाले कारतूस

ईस्ट इंडिया कंपनी की राज्यों को हड़पने और फिर इसाई मिशनरियों द्वारा धर्मातरण की नीति ने लोगों के मन में अंग्रेजी हुकुमत के प्रति पहले ही नफरत पैदा कर दी थी और जब कंपनी की सेना की बंगाल इकाई में ‘एनफील्ड पी.53’ बंदूक में नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ तो मामला और बिगड़ गया। इन कारतूसों को बंदूक में डालने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था और भारतीय सैनिकों के बीच ऐसी खबर फैल गई कि इन कारतूसों को बनाने में गाय तथा सूअर की चर्बी का प्रयोग किया जाता है। उनके मन में ये बात घर कर गयी कि अंग्रेज भारतीयों का धर्म भ्रष्ट करने पर अमादा हैं क्योंकि ये हिन्दू और मुसलमानों दोनों के लिए नापाक था।

अब भारतीय सैनिकों के मन में अंग्रज़ों के प्रति नफ़रत लगातार बढ़ रही थी और उनके शक को इस बात ने पुख्ता कर दिया जब उनके बीच हिंदी और उर्दु में लिखी बाइबल मुफ्त में बांटी जाने लगी। भारतीय सैनिकों को लगा कि अंग्रेज़ उनका धर्म परिवर्तन करवाना चाहते है।

भारतीय सैनिक अपनी बात लेकर अंग्रेज़ अफ़सरों के पास पहुँचे और उन्हें कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी का प्रयोग ना करने सलाह दी। मंगल पांडे नाम के एक कट्टर हिंदु सैनिक ने खुलकर उन कारतूसों का विरोध किया।

29 मार्च 1857 की घटना

मंगल पांडे के मन में अंग्रेज़ों प्रति गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था, उनकी पलटन के बाकी सैनिक भी अंग्रेज़ों से कम नफ़रत नही करते थे पर मंगल चर्बी वाले कारतूसों के लेकर कुछ ज्यादा ही गुस्से में थे।

29 मार्च 1857 के दिन दोपहर के समय मंगल पांडे अपनी पलटन के सभी सैनिकों को विद्रोह के लिए भड़काने लगे। उन्होंने भारतीय सैनिकों से कहा कि अब क्रांति का समय आ गया है और उन्हें जो भी गोरा दिखे, उसे वहीं पर ख्तम कर दें। जब इस बात का पता अंग्रेज़ अफ़सर लेफ्टिनेंट बॉग को लगा तो वो फौरन सारा माज़रा देखने अपनी बंदूक के साथ घोड़े पर पहुँचा।

जब मंगल पांडे ने लेफ्टिनेंट बॉग को आते देखा तो उन्होंने अपनी बंदूक से बाग पर निशाना लगा दिया, पर गोली जाकर बॉग के घोड़े पर लगी जिससे बाग और घोड़ा गिर पड़े। तभी मंगल पांडे अपनी तलवार से बॉग पर वार करने ही वाले थे कि एक मुस्लिम सैनिक शेख़ पतलु ने मंगल पांडे को पीछे से पकड़ लिया।

इतने में एक और अंग्रेज़ अफ़सर ह्यूसन आ पहुँचा और उसने सैनिक ईश्वरी प्रसाद को मंगल पांडे को पकड़ने में शेख़ पतलू की सहायता करने का आदेश दिया पर ईश्वरी प्रसाद टालमटोल करने लगा क्योंकि वो भी अंदर से मंगल पांडे की तरफ था। बाकी सभी भारतीय सैनिक खड़े – खड़े सारा माज़रा देख रहे थे पर कोई भी मंगल की सहायता नही कर रहा था और ना ही अंग्रेज़ो की।

तभी एक बड़ा अंग्रेज़ अफ़सर जनरल जॉइस हेयरसे वहां पर पहुँचा और उसने आदेश दिया कि जो भी सैनिक मंगल पांडे को पकड़ने से इंकार करे, उसे फौरन गोली मार दी जाए। इतने में जब मंगल पांडे को लगा कि अब वो अंग्रेज़ों को चंगुल से बच नही पाएंगे, तो उन्होंने गोली से आत्महत्या करने की कोशिश की पर किसी तरह वो बच गए।

10 दिन पहले दे गई थी मंगल पांडे को फांसी

mangal pandey ko fhansi kab di gyi thi

मंगल पांडे को गिरफ़तार करके उन पर मुकद्दमा चलाया गया। कोर्ट में उनसे कहा गया कि वो उन लोगों के नाम बताएं जो विद्रोह में उसके साथ थे जा उनके जैसे विद्रोही विचार ही रखते है। मंगल ने अपने साथियों के नाम बताने से इंकार कर दिया। मंगल को यह लालच भी दिया गया कि अगर वो माफ़ी मांग ले तो उसे कोई सज़ा नही दी जाएगी, पर मंगल पांडे जी ने किसी तरह की माफी मांगने से इंकार कर दिया।

अंत, अपने सीनीयर अंग्रेज़ अफ़सर पर हमला करने और सैनिकों में विद्रोह भड़काने के तथाकथित जुर्म में उन्हें फांसी की सज़ा दे दी गई।

मंगल पांडे को फांसी 18 अप्रैल 1857 को होनी थी, पर लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों के कारण उन्हें 10 दिन पहले ही यानि कि 8 अप्रैल को फांसी दे दी गई।

अंग्रेज़ अफ़सरों का आदेश ना मानने के कारण ईश्वरी प्रसाद को भी 21 अप्रैल को फांसी दे दी गई थी।

मंगल पांडे जिस पलटन में थे, उसके सारे सैनिकों को सस्पेंड कर दिया गया क्योंकि अंग्रेज़ों को शक था कि वो सभी मंगल पांडे जैसे विचार रखते है और किसी भी समय उनके खिलाफ़ विद्रोह कर सकते है।

वहीं शेख पलतू को हवलदार पद पर प्रमोशन दिया गया।

पूरे भारत में भड़क उठा भयंकर विद्रोह

मंगल पांडे की शहीदी की खब़र जब भारत के अन्य हिस्सों में पहुँची तो लोगो में आक्रोश व्याप्त हो गया। जिसके परिणाम स्वरूप 10 मई सन् 1857 को मेरठ की सैनिक छावनी में भी बगावत हो गयी और यह विद्रोह देखते-देखते पूरे उत्तरी भारत में फैल गया।

इस विद्रोह (जिसे भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम भी कहा जाता है) में सैनिकों समेत कई राजा-रजवाड़े, किसान और मजदूर भी शामिल हुए और अंग्रेजी हुकुमत को करारा झटका दिया। इस विद्रोह ने अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश दे दिया कि अब भारत पर राज्य करना उतना आसान नहीं है जितना वे समझ रहे थे।

पर कई गद्दारों के कारण भारतीय पहले स्वतंत्रता संग्राम में असफ़ल हो गए। लगभग 21 रियासतों ने विद्रोह को दबाने में अंग्रेज़ों की सहायता की।

विद्रोह के कारण ईस्ट इंडिया कंपनी इंग्लैंड में अपना विश्वास खो बैठी और भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का अंत करके अंग्रेज़ी शासन लागू कर दिया गया।

मंगल पांडे वर्तमान समय में

भारत सरकार ने 5 अक्टूबर 1984 में मंगल पांडे के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया।

जिस स्थान पर मंगल पांडे ने अंग्रेज़ अफ़सरों पर हमला किया था और जहां उन्हें फांसी दी गई थी वहां अब एक पार्क बना दिया गया है जिसका नाम है- ‘शहीद मंगल पांडे महा उद्यान‘।

सन 2005 में प्रसिद्ध अभिनेता आमिर खान द्वारा अभिनित ‘Mangal Pandey: The Rising’ प्रदर्शित हुई।

जेडी स्मिथ के प्रथम उपन्यास ‘वाइट टीथ’ में भी मंगल पांडे का जिक्र है।

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Comments

  1. Shivank

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  2. Tanveer Hussain

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